पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Thursday, October 21, 2010

गीत 55

आज बसंत जीवंत द्वार पर
अपने अवगुंठित कुंठित जीवन में
मत करो विडंबित उसको।

आज खिलने दो ह़दय-कमल को,
आज भूलो अपना-पराया भूलो
इस संगीत-मुखरित गगन में
अपनी गंध तरंगित कर डालो
इस बहिर्जगत में खोकर दिशा
दो विखेर माधुर्य चतुर्दिक।

अति निविड़ वेदना वन के अंतर में
आज पल्‍लव पल्‍लव से मुखरित रे--
दूर गगन में किसकी राह निहार
आज व्‍याकुल वसुंधरा सजती रे।

मेरे प्राणों को सिहराए दक्षिणी हवा
किसे द्वार-द्वार पर देती दस्‍तक,
यह सौरभ-विह्वल रजनी
किन चरणों के धरणीतल में जाग रही।

ओ रे सुंदर वल्‍लभ, कांत
तेरा गंभीर आह्वान किसके लिए।

Friday, September 24, 2010

गीत 54 : आज गंध-विधुर समीरणे

आज सुगंधियुक्त समीरण में
किसे खोजते भटकूँ वन-वन में।

आज क्षुब्ध नीलाकाश में
कैसा यह चंचल क्रंदन गूँजे।
सुदूर दिगंतर में सकरुण संगीत
कर रहा विचलित मुझे-
मैं खोजूँ किसे अंतर में, मन में
सुगंधियुक्त समीरण में।

ओ रे जानूँ कि नंदन राग में
सुख में उत्सुक यौवन जागे।

आज आम्र मुकुल-सुगंध में
नव पल्लव-मर्मर-छंद में
चंद्र-किरण-सुधा-सिंचित अंबर में
अश्रु-सरस महानंद में
मैं पुलकित किसकी छुअन में
सुगंधियुक्त समीरण में।

Thursday, September 23, 2010

गीत 53 : नामाओ नामाओ आमाय तोमार

झुका दो, झुका दो मुझको अपने
चरण तल में,
करो मन विगलित, जीवन विसर्जित
नयन जल में।

अकेली हूँ मैं अहंकार के
उच्च शिखर पर-
माटी कर दो पथरीला आसन,
तोड़ो बलपूर्वक।
झुका दो, झुका दो मुझको अपने
चरण तल में।

किस पर अभिमान करूँ
व्यर्थ जीवन में
भरे घर में शून्य हूँ मैं
बिन तुम्हारे।

दिनभर का कर्म डूबा मेरा
अतल में अहं की,
सांध्य-वेला की पूजा भी
हो न जाए विफल कहीं।

झुका दो, झुका दो मुझको अपने
चरण तल में,

Wednesday, September 22, 2010

गीत 52 : तुमि आमार आपन, तुमि आछो आमार काछे

तुम ही मेरे अपने हो, तुम हो रहते पास मेरे
कह लेने दो यह बात, हाँ, कह लेने दो।
मेरे जीवन का सारा आनंद, है तुममें में ही
कह लेने दो यह बात, हाँ, कह लेने दो।

मुझे सुधामय सुर दो,
मेरी वाणी सुमधुर करो-
मेरे प्रियतम तुम, यह बात
कह लेने दो, हाँ, कह लेने दो।

यह निखिल आकाश-धरा
यह सब तुमसे ही भरा-पूरा,
मुझे यह बात हृदय से अपने
कह लेने दो, हाँ, कह लेने दो।

दुःखी जानकर पास आ जाओ,
छोटा मानकर प्यार जताओ,
मेरे छोटे मुख से यह बात
कह लेने दो, हाँ, कह लेने दो।

Tuesday, September 21, 2010

गीत 51 : कोन आलोते प्राणेर प्रदीप

किस प्रकाश से प्राण-प्रदीप
जलाकर तुम धरा पर आते-
ओ रे साधक, ओ रे प्रेमी,
ओ रे पागल, धरा पर आते।

इस अकूल संसार में
दुःख-आघात तुम्हारी प्राणवीणा की झंकार में।
घोर विपदा-बीच भी,
किस जननी के मुख की हँसी देखकर हँसते।

तुम हो किसके संधान में
सकल सुखों में आग लगाकर घूम रहे, कोई न जाने।
इस तरह आकुल-व्याकुल कर
कौन रुलाए तुम्हें, जिसे तुम प्यार हो करते।

तुम्हारी कोई चिन्ता नहीं-
कौन तुम्हारा संगी-साथी, यही सोचती मन में।
मृत्यु को भूलकर तुम
किस अनंत प्राण-सागर में आनंदित हो तिरते।

Monday, September 20, 2010

गीत 50 : निभृत प्राणेर देवता

एकाकी हैं जहाँ जागते
देवता निभृत प्राणों के,
भक्त, वहीं खोलो द्वार
आज करूँगी दर्शन उनके।

सारा दिन केवल बाहर ही
घूम-घूम किसको चाहूँ रे,
सांध्य-बेला की आरती
सीख नहीं मैं पाई रे।

तुम्हारे जीवन के प्रकाश से
अपना जीवन-दीप जलाऊँ
हे पुजारी, निभृत में आज
मैं अपनी थाल सजाऊँ।

जहाँ पर निखिल की साधना
करे पूजालोक की रचना
वहीं पर मैं भी आँकूँगी
बस एक ज्योति रेखा।

Friday, September 17, 2010

गीत 49 : हेथाय तिनि कोल पेतेछेन

यहीं आन वे आज विराजे
हमलोगों के इस घर में।
सजा दो उनका आसन भाई
अच्छा लगे जो मन में।

आनंद-मग्न हो गाते हुए
धूल बुहारो, झाड़ो सारी।
सावधानी से दूर हटा दो
कूड़ा-कचरा है जो भी।
जल छिड़ककर फूलों को
रखो भरकर डाली में-
सजा दो उनका आसन भाई,
अच्छा लगे जो मन में।

दिन-रात वे हैं विराजे
हमलोगों के इस घर में,
सुबह-सवेरे उनकी हँसी
आलोक बिखेरे घर में।

ज्योंही सुबह जागकर उठकर
नयन मिलाना चाहूँ।
खुश हो वे खुश देखना चाहें
मुझको, ऐसा पाऊँ।
उनके मुख की हँसी-खुशी
भर जाए पूरे घर में।

सुबह-सवेरे उनकी हँसी
आलोक बिखेरे घर में।
अकेले ही वे बैठे रहते
हमलोगों के इस घर में।

हमसब जब भी अन्य कहीं
चले जाते अपने काम में।
द्वार तक आ प्रसन्न मुख से
विदा हमको हैं वे कर जाते-
प्रमुदित मन से बढ़ते पथ पर
आनंदित हो हम गाते-गाते।

निपटाकर सारे काम जब लौटें
दिन ढलने पर हम घर में,
पाएँ उनको अकेले बैठे
हमलोगों के इस घर में।

वे जगे हुए बैठे रहते हैं
हमलोगों के इस घर में
हम सब जब चेतना खोकर
सोए रहते हैं बिस्तर में।

जगत में कोई देख न पाता
छुपी हुई उनकी बाती,
ओट में रखकर आँचल के
वे सारी रात जलाएँ जोती।

नींद में बहुत सारे सपने
हैं आते-जाते रहते,
अंधकार में मुस्काते वे
हमलोगों के इस घर में।

Thursday, September 16, 2010

गीत 48 : आकाशतले उठलो फुटे

आकाशतल में फूट पड़ा है
आलोकमान शतदल।
पंखुड़ियाँ सब एक-एक कर
बिखर गईं दिक्-दिगंतर,
ढँक गया अंधकार का
निबिड़ काला जल।

ठीक बीच में स्वर्णकोष के
आनंदित बैठी हूँ भाई
मुझे घेरकर बिखरे धीरे
आलोकमान शतदल।

आकाश में तो लहराकर
बहती जाए हवा।
चतुर्दिक गूँजें गान,
चतुर्दिक नाचें प्राण,
गगन-भरा यह परश
छूए पूरी काया।

इस प्राण-सागर में डुबकी लेकर
प्राणों को भर रहा वक्ष में,
लौट-लौटकर, मुझे घेरकर
बहती जाए हवा।

दशों दिशाएँ फैला आँचल
धरा ने अपनी गोद बनाई।
जीव हैं जो भी जहाँ
सबको वह बुलाके लाती,
सबके हाथों, सबके पात्रों में
अन्न है वह बाँट देती।

गीत-गंध से भर गया मन,
महानंद में बैठी हूँ मैं
मुझे घेरकर आँचल फैला
धरा है गोद देती।

आलोक, तुमको करूँ प्रणाम
क्षमा करो, मेरा अपराध।
ललाट पर मेरे अंकित कर दो
परमपिता का आशीर्वाद।

हवा, तुमको करूँ प्रणाम
दूर करो मेरा अवसाद।
संचरित हो मेरी सकल देह में
परमपिता का आशीर्वाद।

धरा, तुमको करूँ प्रणाम
मिटा दो मेरी सारी साध।
घर भर के लिए फलित हो
परमपिता का आशीर्वाद।

Wednesday, September 15, 2010

गीत 47 : रूप सागरे डुब दियेछि

रूप-सागर में लगाकर डुबकी
अरूप रतन की आशा करती,
भटकूँगी अब न घाट-घाट पर
उतारने को अपनी जर्जर नौका।

इस बार घड़ी वह आ ही जाए
लहरों से टकराव, अब नहीं बस,
इस बार सुधा की तल में जाकर
मरकर भी मुझको अमर है बनना।

जो गान नहीं सुना कानों से
वह गान जहाँ नित्य ही गूँजे
जाऊँगी लेकर प्राणों की वीणा
उसी अतल में, बीच सभा में।

चिरंतन सुरों को साधकर
अंत में अपना रुदन पिरोकर
नीरव है जो, पैरों में उसके
धर दूँगी यह नीरव वीणा।

Monday, September 13, 2010

गीत 46 : आसनतलेर माटिर प'रे लुटिये रबो

आसन तले माटी में ही रहूँगी लोटती।
होऊँगी धूल-धूसरित चरण-धूलि में तुम्हारी।

क्यों मुझको देकर मान, रखते हो इतनी दूर,
जनम-जनम तक ऐसे ही, रखना नहीं भुलाए,
जैसे-तैसे पकड़कर-खींचकर डालो अपने पैरों में।
होऊँगी धूल-धूसरित चरण-धूलि में तुम्हारी।

मैं तुम्हारे यात्राी दल में रहूँगी पीछे
मुझको देना स्थान, तुम सबसे नीचे।

कितने ही लोग दौड़े आते पाने को प्रसाद,
मुझे न कुछ भी चाहिए, बस रहूँ पास-
सबके अंत में जो भी बचे, बस लूँगी वही।
होऊँगी धूल-धूसरित चरण-धूलि में तुम्हारी।

Thursday, September 9, 2010

गीत 45 : आलोय आलोकमय करे हे

आलोक से करते हुए आलोकित
आए आलोकों के आलोक।
मेरे नयनों से अंधकार
दूर हुआ, हाँ दूर हुआ।

सकल आकाश, सकल धरा
आनंद-उल्लास से परिपूरित,
जिधर भी मैं देख जहाँ तक पाऊँ
सबकुछ है कितना अच्छा।

पेड़ों के पत्तों में आलोक तुम्हारा
नाचकर भरता प्राण।
पहुँचकर घोंसलों में चिड़ियों के
जगाकर करता गान।

स्नेहिल यह आलोक तुम्हारा
पड़ता आकर गात पर मेरे,
निर्मल हाथों हृदय को मेरे
सहला रहा, सहला रहा।

Wednesday, September 8, 2010

गीत 44 : जगते आनंद-यज्ञे आमार निमंत्रण

जगत के आनंद-यज्ञ में मिला निमंत्रण।
धन्य हुआ, धन्य हुआ, मेरा मानव-जीवन।

रूपनगर में नयन मेरे
घूम-घूमकर साध मिटाते,
कान मेरे गहन सुरों में
हुए हैं मगन।

अपने यज्ञ में तुमने भार दिया है
मैं बजाऊँ वंशी।
पिरोकर गान-गान में घूमूँ
रुदन-हँसी प्राणों की।

अब घड़ी आ गई है क्या?
सभा में जाकर तुमको देखूँ
‘जयध्वनि’ सुनकर जाऊँगा,
है मेरा यही निवेदन।

Tuesday, September 7, 2010

गीत 43 : प्रभु, आजि तोमार दक्षिण हात

प्रभु आज छुपाकर मत रखो
अपना दायाँ हाथ।
राखी बाँधने आई हूँ
मैं तुमको हे नाथ।

यदि बाँधूँ तुम्हारे हाथ में
बँध जाऊँ सबके साथ में,
जहाँ कहीं भी कोई भी हो
रह न पाएगा बाकी।

आज बस भेद न रहे
अपने-पराये का,
तुमको बाहर-घर में जैसे
देख पाती एक-सा।

तुमसे विच्छेद के चलते ही
रो-राकर मैं भटकती
हो मिलन क्षणभर का भी
मैं तुम्हें पुकारती।

Monday, September 6, 2010

गीत 42 : गाये आमार पुलक जागे

मेरे तन में पुलक जगी है,
आँखों में हुई घनघोर-
हृदय में मेरे किसने बाँधी
राखी की रंगीन डोर।

आज इस आकाश के नीचे
जल में, थल में, फूल में, फल में
किस प्रकार हे मनोहरण,
छितराया मेरा मन।

कैसा खेल हुआ है मेरा
आज तुम्हारे संग में।
पाया है क्या खोज-भटककर
सोच न पाऊँ मन में।

आनंद आज कैसे किस ढब से
आँसू छलकाए आँखों में,
मृदु-मधुर बनकर विरह आज
कर गया प्राणों को विभोर।

Friday, September 3, 2010

गीत 41 : एइ मलिन वस्‍त्र छाड़ते होबे

यह मलिन वस्त्र छोड़ना होगा
छोड़ना होगा इस बार-
मेरा यह मलिन अहंकार।

दिन के कामों में धूल लगी
अनेक दागों में हुआ दागी
वैसे भी यह तपा हुआ है
इसको सहना भार
मेरा यह मलिन अहंकार।

अब जब निपटे सारे काम
दिन के अवसान में,
उसके आने का समय हुआ,
आशा जगी प्राण में।

अब स्नान करके आओ तब
पहनने होंगे प्रेम वसन,
संध्या वन के फूल चुनकर
गूँथना होगा हार।

अरे आओ भी
समय नहीं जो और।

Tuesday, August 31, 2010

गीत 40 : जा हारिये जाय ता आगले ब'से

जो खो जाता है, उसे बैठकर
जोगूँ और कितना।
अब रात में जाग न सकता नाथ
संभव भी न सोचना।

दिन-रात हूँ मैं अनवरत
बंद किए हुए अपना द्वार,
आना जो चाहे, शंका में उसे
भगा देती बार-बार।

तभी तो आना किसी का हुआ नहीं
बस मेरे ही घर।
आनंदमय भुवन तुम्हारा
रहे खेलता बाहर।

जानूँ तुम्हें भी राह न मिलती,
लौट जाते हो आ-आकर,
जिसे रखना चाहूँ, वह भी न रहे-
मिट्टी में मिल जाए।

Monday, August 30, 2010

गीत 39 : हेथा जे गान गाइते आसा आमार

यहाँ जो गीत गाने आई थी मैं
वह गीत गाया जा न सका-
आज भी सुर-साधना ही हो रही बस
मैं तो चाहूँ गीत गाना।

मुझसे सधता ही नहीं वह सुर
मुझसे उठते नहीं वे बोल,
केवल प्राणों के ही बीच उठी है
गाने की व्याकुलता।
आज भी खिला ही नहीं वह फूल
बस बहती एक-सी हवा।

मैंने देखा नहीं मुख उसका
मैंने सुनी न उसकी वाणी,
केवल पल-पल सुनती उसकी
पैरों की बस ध्वनि।
मेरे द्वार के सामने से ही वह
करता है आना-जाना।

केवल मैं आसन ही रही बिछाती
गुजर गया सारा दिन-
घर में दीप जलाना हुआ नहीं है
कैसे जाए उसे पुकारा।
हूँ उसको पाने की आशा में
हुआ न उससे मिलना।

Friday, August 27, 2010

गीत 38 : शरते आज कोन अतिथि

शरत में आज कौन अतिथि
आया प्राणों के द्वारे।
आनंद-गान गा रे हृदय
आनंद-गान गा रे।

नीले आकाश की नीरव कथा
शिशिर में भीगी व्याकुलता
मुखरित हो ये आज तुम्हारी
वीणा के तार-तार में।

धान के खेतों के स्वर्ण गान में
लय मिला रे आज समान तान में,
मिला दे सुर प्लावित नदी की
अमल जलधार में।

आया है जो उसके मुख पर
देख चाहकर गहन सुख में
द्वार खोलकर साथ में उसके
बाहर निकल जा रे।

Thursday, August 26, 2010

गीत 37 : निशार स्‍वपन छुटलो रे एइ

रात्रि स्वप्न टूट गया रे
टूट गया रे।
छूटा बंधन छूट गया रे।

प्राणों पर अब रहा न परदा,
जगत-जंजाल से बाहर आए,
हृदय शतदल की पंखुड़ियाँ सब
अब फूट गई रे
फूट गई रे।

अंततः तोड़कर द्वार मेरा
जैसे ही सम्मुख खड़े हुए
आँसुओं में डूबा हृदय
चरण-तलों में लोट गया रे।

आकाश से प्रभात-किरणों ने
बढ़ाए हाथ मेरी ओर,
मेरी कारा के टूटे द्वार से
जय ध्वनि उठ चली रे
उठ चली रे।

Wednesday, August 25, 2010

गीत 36 : पारबि ना कि जोग दिते एइ छंदे रे

बिठा न पाओगे लय-ताल क्या इस छंद में,
इस गिर जाने, बह जाने
टूट जाने के आनंद में।

कान लगाकर सुनो न
दिशा-दिशा में, गगन-बीच भी
कालवीणा पर क्या सुर बाजे
तपन तारा-चाँद में
यह आग जलाकर धू-धूकर
जल जाने के आनंद में।

पगलानेवाली गान की तान में
दौड़े यह कहाँ, कोई न जाने,
पीछे मुड़कर न देखना चाहे
रहे न बँधकर किसी बंध में
इस लुट जाने, छूट जाने
चलने के आनंद में।

उसी आनंद-चरण-पथ में
षड् ऋतुएँ हैं उन्मत्त नृत्य में,
धरती प्लावित होती जाए
स्वागत-गीत की गंध में
इस फेंके जाने, छोड़े जाने
मर जाने के आनंद में।

Tuesday, August 24, 2010

गीत 35 : एसो हे, एसो, सजल घन

आओ हे आओ सजल घन,
बरसने को बादल-
आओ हे लेकर इस जीवन में
विपुल अपना स्नेह श्यामल।

आओ हे गिरि-शिखर चूमकर
छाया बन जंगल-धरा पर-
आओ हे तुम गगन में छाकर
करते हुए घोर गर्जन।

व्यथित हो उठे कदंब के वन
पुलकित हैं फूल।
उछल रहे करते कल-रोदन
नदियों के सब कूल।

आओ हे आओ हृदयविहारी,
आओ हे आओ तृष्णाहारी,
आओ हे नयन-सुखकारी,
आन बसो मेरे मन।

Monday, August 23, 2010

गीत 34 : आमार मिलन लागि तुमि

मेरे मिलन के लिए तुम
हो कब से ही आ रहे।
कहाँ रखेंगे ढँककर तुमको
चंद्र-सूर्य तुम्हारे।

कितनी ही बार साँझ-सकारे
तुम्हारी पगचाप सुनाई पड़े।
दूत चुपके से अंतरतर में
गया है मुझको बुलाके।

अरे ओ पथिक, आज तो मेरे
प्राणों में है स्पंदन
रह-रहकर उठती है देखो
हर्ष की सिहरन।

देखो समय आ गया आज,
खत्म हुए सब मेरे काज-
हवा आ रही हे महाराज,
तुम्हारी गंध लेके।

Friday, August 20, 2010

गीत 33 : आबार एरा घिरेछे मोर मन

फिर इन्हीं से घिरा मेरा मन
फिर आँखों में उतरा आकाश।

फिर यह कितनी ही बातों में उलझा,
चित्त मेरा नाना दिशाओं में भटका,
दाह फिर बढ़ उठा है क्रमशः,
फिर यह खो बैठा श्रीचरण।

तुम्हारी नीरव वाणी हृदय तल में
कहीं डूबे न जग के कोलाहल में।

रहो सबके बीच भी साथ मेरे,
रखो सदा ही मुझको अपने अंतर में,
चेतना पर मेरी रखो निरंतर
आलोक भरा उदार त्रिभुवन।

Wednesday, August 18, 2010

गीत 32 : दाओ हे आमार भय भेंगे दाओ

हे, मेरे भय को नष्ट करो।
मुख अपना मेरी ओर करो।

रहकर पास नहीं पहचाना,
जाने किधर क्या रहा देखता,
तुम्हीं हो मेरे हृदयविहारी,
सस्मित आकर हृदय विराजो।

करो मुझसे कुछ बात करो,
मेरी काया का परस करो।
बढ़ाओ अपना हाथ दाहिना
मुझे थामकर तुम उबार लो।

जो भी समझूँ, सब गलत लगे,
जो भी खोजूँ, सब गलत लगे-
हँसना मिथ्या, रोना मिथ्या
दर्शन देकर भ्रम दूर करो।

Tuesday, August 17, 2010

गीत 31 : आमि हेथाय थाकि शुधु

मैं यहाँ ठहरी हूँ बस
गाने को तुम्हारे गान,
दे दो अपनी जगत सभा में
मुझको भी थोड़ा स्थान।

मैं तुम्हारे इस भुवन में
हे नाथ, किसी काम न आई,
बस केवल सुर में बजते रहे
निरर्थक ही ये प्राण।

रात में, नीरव मंदिर में
जब हो तुम्हारा आराधन।
मुझको दो आदेश
गाने का हे राजन।

सुबह जब आकाश हो गूँजित
स्वर्ण वीणा के सुरों में
रह न जाऊँ मैं उनसे वंचित
इतना देना मुझको मान।

Monday, August 16, 2010

गीत 30 : एइ तो तोमार प्रेम, ओगो

यही तो तुम्हारा प्रेम, अहो
हृदय-हरण,
यह जो पत्तों पर थिरके प्रकाश
स्वर्ण-वरण।

यह जो मधुर आलस भरे
आकाश में मेघ तिरे,
यह जो हवा देह में करे
अमृत-क्षरण
यही तो तुम्हारा प्रेम, अहो
हृदय-हरण।

प्रभात-प्रकाश धारा में मेरे
नयन डूबे हैं।
अभी सुनकर तुम्हारी प्रेम-वाणी
प्राण जगे हैं।

यही तुम्हारा आनत मुख है,
जिसने चूमे मेरे नयन,
परस किए हैं हृदय ने मेरे
आज तुम्हारे चरण।

Sunday, August 15, 2010

गीत 29 : धने जने आछि जड़ाये हाय

हाय, बँधी हुई हूँ धन-जन से,
लेकिन जानते हो, मन तुम्हें ही चाहे।

अंतर में हो, हे अंतर्यामी--
मुझको मुझसे अधिक जानते, स्वामी--
सब सुख-दुख, भूल-भ्रम में भी
जानते हो, मेरा मन तुम्हें ही चाहे।

छोड़ न पाई अहंकार,
सिर पर ढोती घूम रही हूँ,
हाय, छोड़ने पर ही तो बचूँगी मैं--
तुम जानते हो, मन तुम्हें ही चाहे।

जो मेरा है सबकुछ कब तुम
अपने हाथों में उठा लोगे।
सब छोड़कर सब पाऊँगी तुम्हीं में,
मन ही मन, मन तुम्हें ही चाहे।

Saturday, August 14, 2010

गीत 28 : प्रभु, तोमा लागि ऑंखि जागे

प्रभु तुम्हारे लिए हैं अँखियाँ जागीं
नहीं सूझती राह
दिखाओ
जो मन को अच्छा लगे।

धूल में बैठा द्वार पर
भिक्षुक हृदय यह हाय
तुम्हारी करुणा माँगे।
नहीं मिली कृपा
वह चाहूँ,
जो मन को अच्छा लगे।

आज इस संसार में
कितने ही सुख और कामों में
सब निकल गए आगे।
साथी मिला न मुझको
तुम्हें ही चाहूँ,
जो मन को अच्छा लगे।

चारों ओर सुधा सरसे
व्याकुल श्यामल धरती
रो रही अनुराग में
हुए न दर्शन
मिली व्यथा
जो मन को अच्छा लगे।

Friday, August 13, 2010

गीत 27: आज वारि झरे झर झर

आज बरस रहा पानी झर-झर
भरी बदरी से।
आकाश फोड़कर आकुल धारा
कहीं न ठहरे।

ठहर-ठहरकर शाल वनों में
आँधी चली भर हुँकारे,
झूम-झूमकर पानी बरसे
मैदानों में।
आज मेघ-घटाएँ लहराकर
नाच रहा है कौन।

अरे वर्षा पर मोहित मेरा मन,
हुआ निछावन झंझा पर,
दंडवत होकर तरंग मेरी
पड़ी है किसके चरणों पर।

अंतर में आज कैसा कोलाहल,
तोड़कर द्वारों की अर्गलाएँ
जाग गया अंतर का पागल
इस भादो में।

आज ऐसे कौन हुआ उन्मत्त
बाहर और घर में।

Thursday, August 12, 2010

गीत 26 : आर नाइ रे बेला, नामल छाया

और बचा न दिन, उतरी छाया
धरती पर।
अब कलशे भरने को चल रे
घाट पर।

जलधारा के कलकल स्वर में
सांध्य गगन करता आकुल,
अरे पुकारे उन्हीं स्वरों में
पथ पर।
कलशे भरने को चल रे
घाट पर।

अब विजन पथ पर न कोई
आता-जाता-
अरे प्रेम-नदी में ज्वार उठा,
उत्ताल हवा।

नहीं जानती, लौटूँगी या नहीं,
आज होगा किससे परिचय,
घाट पर वही अजाना बजाए वीणा
नौका पर।
कलशे भरने को चल रे
घाट पर।

Wednesday, August 11, 2010

गीत 25 : हेरि अहरह तोमार विरह

अहरह तुम्हारा विरह मैं पाती
विराजित भुवन-भुवन में।
सजा हुआ नाना रूपों में
भूधर, कानन, सागर और गगन में।

हरेक तारे में रात भर
अनिमेष नेत्रों से खड़ा नीरव,
सावन की फुहार में पल्लव दलों पर
मुखरित है तुम्हारा ही विरह।

तुम्हारा गहन विरह ही है समाया
घर-घर आज अनंत वेदनाओं में,
न जाने कितने प्रेमों और कितनी वासनाओं में
कितने ही सुख-दुख और कामकाजों में।

जीवन भर उदास करके
कितने ही गानों-सुरों का रूप धर
विरह तुम्हारा ही उमगता
मेरे हृदय के बीच से।

Saturday, July 31, 2010

गीत 24 : जदि तोमार देखा ना पाइ, प्रभु

यदि तुम्हारे दर्शन ना पाऊँ, प्रभु,
इस बार के जीवन में
तब तुम्हें मैं पा न सकी
यह बात रहेगी मन में
इसे भुला न पाऊँ, वेदना पाऊँ
सोते हुए भी स्वप्न में।

इस दुनिया के हाट में
मेरे इतने सारे दिन बीते
मेरे हाथों में इतना धन आया
तब भी कुछ पा न सकी मैं
यह बात रहेगी मन में
इसे भुला न पाऊँ, वेदना पाऊँ
सोते हुए भी स्वप्न में।

Friday, July 30, 2010

गीत 23 : एमन आड़ाल दिये लुकिये गेले चलबे ना

ऐसे ओट लेकर छिपने से
कैसे चलेगा।
अब बीच हृदय में बैठो छुपकर
न कोई जान पाएगा, न टोकेगा।

तुम्हारी लुकाछिपी की दुनिया में,
कितना घूमूँ देश-विदेश,
अब वचन दो मुझको नहीं छलोगे
मन के कोने में रहोगे।
ओट लेकर छिपने से
कैसे चलेगा।

जानूँ मेरा यह हृदय कठोर
सखे पर क्या तुम्हारा परस पाकर भी
डाल दिया तुमने मुझे किस फंदे में
इसमें न आएगी सरसता।

नहीं है, मेरी नहीं साधना,
किंतु जो बरसे कृपा तुम्हारी।
तब निमिष में क्या फूल न खिलेंगे
और क्या फल न फलेगा।
ओट लेकर छिपने से
कैसे चलेगा।

Thursday, July 29, 2010

गीत 22 : तुमि केमन करे गान करो जे गुणी

तुम कैसे गाते हो गान, गुणी,
अवाक् हो सुनूँ, केवल सुनूँ।

सुर का प्रकाश छाया भुवन में,
चली सुर की हवा बहती गगन में,
टूटते पाषाण व्याकुल वेग में
बहती ही जाए सुरों की सुरधुनी।

जी चाहता उसी सुर में गाऊँ।
कंठ में अपने सुर खोज न पाऊँ।

कहना जो चाहूँ, कह न पाऊँ,
पराजय मानने में प्राण मेरे रोएँ,
डाल दिया तुमने मुझे किस फंदे में
बुनकर सुरों का जाल मेरे चतुर्दिक्।

Wednesday, July 28, 2010

गीत 21 : जानि जानि कोन आदिकाल हते

जानती मुझे किस आदिकाल से
बहा रखा इस जीवन-प्रवाह में,
प्रिय, सहसा छोड़ गए कितने ही
घर, पथ, प्राणों में इतना हर्ष।

असंख्य बार तुम मेघों की ओट में
मधुर मुस्कान के साथ हुए खड़े,
अरुण किरणों के साथ बढ़ाए चरण
ललाट पर किया शुभ स्पर्श।

संचित हैं इन आँखों में
असंख्य काल और लोकों में
असंख्य नवीन आलोकों में
अरूप के असंख्य रूप-दर्श।

कोई न जाने, कितने युग-युगों से,
भर-भर उमड़ रहा प्राणों में
असंख्य सुख-दुःख और प्रेम-गानों में
बरस रहा ऐसा अमृत-रस।

Tuesday, July 27, 2010

गीत 20 : आजि झड़ेर राते तोमार अभिसार

आज तूफानी रात में हो तुमसे अभिसार,
प्राणसखा, हे मेरे प्यार।

आकाश रोता हताश-सा,
नींद नहीं मेरी आँखों में,
द्वार खोलकर, हे प्रियतम,
चाहूँ बस तुमको बार-बार
प्राणसखा, हे मेरे प्यार।

बाहर कुछ भी देख न पाऊँ,
तुम किस पथ पर मन में लाऊँ।

सुदूर किस नदी के पार,
किस गहन वन के पास,
कौन-सा घन अंधकार
कर रहे तुम पार।

प्राणसखा, हे मेरे प्यार।

Monday, July 26, 2010

गीत 19 : आषाढ़-संध्‍या घनिए एलो

आषाढ़-संध्या घिर आई,
दिन फिर गया गुजर।
बंधनहारा वृष्टिधारा
झर रही रह-रहकर।

घर के कोने में बैठ अकेले
यह सोचूँ मन ही मन मैं
भीगी हवा जूही के वन में
कौन-सी बात कहे जाकर।

बंधनहारा वृष्टिधारा
झर रही रह-रहकर।

ज्वार उठा है अंतर में,
खोज न पाऊँ कूल।
रोते प्राण, सुरभि से जब
भीगे वन के फूल।

अँधेरी रात के इन प्रहरों में,
गाऊँ मैं किन सुरों में,
हूँ मैं आकुल-व्याकुल
सब भूल जाऊँ कहाँ खोकर।

बंधनहारा वृष्टिधारा
झर रही रह-रहकर।

Sunday, July 25, 2010

गीत 18 : आजि श्रावण-घन-गहन-मोहे

आज सावन-घन-गहन-मोह में
कदम बढ़ा अपने चुपचाप
रात की तरह होकर निश्शब्द
बचाकर आए सबकी आँख।

सुबह ने आँखें ना खोलीं,
व्यर्थ पुकारती जाती हवा,
फैलाकर किसने काले बादल
निर्लज्ज नीले नभ को ढँका।

कलरवविहीन कानन सारे
बंद घरों के द्वार सब
एकाकी हो तुम पथिक कौन
पथिकहीन इस पथ पर।

हे एका सखा, हे प्रियतम,
खुला पड़ा है, यह मेरा घर,
दर्शन देकर सपने-जैसा
जाना नहीं मुझे ठुकराकर।

Saturday, July 24, 2010

गीत 17 : कोथाय आलो, कोथाय ओरे आलो

कहाँ है प्रकाश, प्रकाश है कहाँ अरे?
विरहानल की ज्वाला से जलाओ उसे।
दीपक है रखा, पर नहीं है शिखा,
है क्या यही, कपाल पर लिखा-
इससे तो अच्छा मर जाना।
विरहानल से दीप जलाना।

वेदना देती आकर संदेश-‘अरे ओ प्राण,
तुम्हारे लिए ही जाग रहे भगवान।
घनी अँधेरी रात में बुला रहे
प्रेमाभिसार के लिए तुझे,
दुःख देकर रखते तेरा मान।
तुम्हारे लिए ही जाग रहे भगवान।’

आकाश गया है बादलों से भर,
बरस रहा है पानी झर-झर।
किसके लिए घोर ऐसी रात में
जाग उठे हैं अचानक प्राण मेरे
ऐसा कयों होता रह-रहकर।
बरस रहा है पानी झर-झर।

क्षण भर का यह विद्युत प्रकाश,
आँखों में लाता घनांधकार।
न जाने कहाँ, कहीं बहुत दूर
गान बजा, है गहन सुर,
खींचता मेरे प्राण अपनी ओर।
आँखों में लाता घनांधकार।

कहाँ है प्रकाश, प्रकाश कहाँ है अरे?
बिरहानल की ज्वाला से जलाओ उसे।
बुलाता मेघ, हाँकती हवा,
न होगा जाना, जो सय गया,
है रात काली, निकष-घन जैसे।
प्रेम का दीपक जलाओ प्राण देके।

Friday, July 23, 2010

गीत 16 : मेघेरे परे मेघ जमेछे

घन के ऊपर घन घनघोर
करते आ रहे अँधेरा-
बिठा रखा है मुझको क्यों
द्वार के पास अकेला।

व्यस्त दिनों में काम-धाम में
रहती लोगों के संग-साथ में,
आज जो बैठी हूँ मैं यहाँ
लेकर बस तेरी ही आशा
बिठा रखा है मुझको क्यों
द्वार के पास अकेला।

यदि न तुम दर्शन दो
करो मेरी अवहेला,
फिर कैसे कटेगी मेरी
ऐसी बादल-बेला।

दूर तक बिछाए पलक पाँवड़े
देखती बस तुम्हारी ही राह
भटकते रो-रोकर प्राण मेरे
और यह तूफानी हवा।
बिठा रखा है मुझको क्यों
द्वार के पास अकेला।

Thursday, July 22, 2010

गीत 15 : जगत जुड़े उदार सुरे

आनंद गान है गूंजित जिससे
जुड़ा जगत उदार सुर में,
वह गान उच्च स्वरों में कब
गूँजेगा अंतरतर में।

आकाश, प्रकाश, हवा और जल
होगा कब इनसे प्रेम-प्रसंग।
हृदय-सभा में जुटकर सारे
बैठेंगे कब नाना रूपों में।

ये नैन खुलेंगे कब
कि प्राणों को मिले खुशी
जिस पथ से चलते जाएँ
सबको हो संतुष्टि।

तुम्हारा साथ है, यह बात कब
जीवन में होगी सत्य सहज
ध्वनित होगा सब कर्मों में
तुम्हारा नाम सहज ही कब।

Wednesday, July 21, 2010

गीत 14 : जननी, तोमार करुण चरणखानि

जननी तुम्हारे दोनों करुण चरण
दिखे हैं आज इस अरुण किरण में।

जननी तुम्हारी मृत्युंजय वाणी
भर जाए चुपके से नीरव गगन में।

तुम्हें नमन है निखिल भुवन में,
तुम्हें नमन है सब जीवन-कर्म में,
तन-मन-धन करूँ आज समर्पण
तुम्हारे भक्तिपावन पूजार्चन में।

जननी तुम्हारे दोनों करुण चरण
दिखे हैं आज इस अरुण किरण में।

Tuesday, July 20, 2010

गीत 13 : आमार नय-भुलानो एले

मेरे नयनों को मोहित करने आई
मैं हृदय खोलकर देख तुम्हें क्या पाई।

पारिजात के नीचे आस-पास
राशि-राशि झरे फूलों में
ओस से भीगी घासों में
आलता-रँगे चरण बढ़ाई
नयनों को मोहित करने आई।

धूप-छाँही तेरा आँचल
फैला है जंगल-जंगल,
फूल सभी बस तुम्हें देखकर
कहते हैं यह मन ही मन।

करेंगे हम तुम्हारा वरण,
हटा दो मुख से आभरण,
और यह जो मेघावरण
दोनों हाथों से दो सरकाई
नयनों को मोहित करने आई।

वनदेवी के द्वार-द्वार पर
उच्च शंख-ध्वनि पडे सुनाई
गगन-वीणा के तार-तार में
तेरे ही आने की बधाई।

कहाँ बज रहे स्वर्ण नूपुर,
अरे यह तो मेरे अंतरतर में,
सभी भाव और सभी काम में
तुम सरस सुधा सरसाने आई
नयनों को मोहित करने आई।

Monday, July 19, 2010

गीत 12 : लेगेछे अमल धवल पाले

अमल धवल पाल से लगती
मंद-मधुर हवा।
देखी नहीं, कभी ना देखी
तिरते ऐसे नइया।

किस सागर के पार से लाती
सुदूर पड़ा कौन-सा धन।
मन भी चाहे बहते जाना,
छोड़ते जाना इसी किनारे
जो भी सब चाहा-पाया।

पीछे लगी है जल की झड़ी
गुरु गुरु बोले मेघ,
चेहरे पर पड़ती अरुण किरण
जब फट जाते मेघ।

अरे ओ कर्णधार, कौन हो तुम,
किसकी खुशी-रूलाई का धन।
सोच-सोच विचलित मेरा मन,
किस सुर में आज सजेंगे साज
किस मंत्र का होगा गान।

Sunday, July 18, 2010

गीत 11 : आमरा बेंधेछि काशेर गुच्‍छ

हमने बाँधे हैं काश-गुच्छ, हमने
गूँथी हैं शेफाली-माला।
नए धान की मंजरियों से
सजाकर लाए हैं डाला।

पधारो हे शारद-लक्ष्मी
अपने उज्ज्वल मेघरथ पर,
पधारो निर्मल नीले पथ पर,
पधारो धवल श्यामल
आलोक में झलमल
वन-गिरि-पर्वत पर।
पधारो शीतल ओसकणों से सज्जित
श्वेत शतदल का मुकुट पहन।

उमड़ी हुई गंगा के तट पर
निभृत निकुंज में बिछा है आसन
झरे मालती फूलों से।
राजहंस घूमते पंख पसारे
तुम्हारे चरणों के नीचे।

अपनी स्वर्ण वीणा के तारों की
गुंजर-तान उठाओ
मृदुल मधुर झंकार में,
हो उठेगा विगलित सस्मित सुर
क्षणिक अश्रुधार में।

रह-रहकर जो पारसमणि
झलक उठती तुम्हारी अलकों में
पलकें करुणासिक्त कर
परश कराओ मेरे मन का
भावनाएँ सकल बन जाएँ सोना
हो जाए आलोकित अंधकार।

Saturday, July 17, 2010

गीत 10 : तोमार सोनार थालाय साजाबो आज

तुम्हारी स्वर्ण-थाल में सजाऊँगा आज
दुःखों की अश्रुधार।
हे माते, गूँथूँगा मैं तुम्हारे
गले का मुक्ताहार।

चरणों से लिपटे हैं
चंद्र-सूर्य बनकर माला,
तुम्हारी छाती पर शोभित मेरे
दुःखों के अलंकार।

धन-धान्य तो सब तेरे ही,
क्या करना है, यह तो बोलो।
देना चाहो तो दे दो मुझको
लेना चाहो तो वापस लो।

दुःख तो मेरे घर की खेती,
असली रत्न, तुझे पहचान-
अपनी कृपा के बदले तू खरीदती
है इसका मुझको अहंकार।

Friday, July 16, 2010

गीत 9 : आनंदरेइ सागर थेके

आनंद-रूपी सागर में
उठा है आज ज्वार।
खींचो-खींचो मिलकर सभी
आज बैठ थामो पतवार।

हो चाहे जितना भी बोझ
पार करेंगे दुःख की नइया,
लहरों से भी जूझेंगे हम
उड़े भले ही प्राण चिरइया।
आनंद-रूपी सागर में
उठा है आज ज्वार।

कौन पुकारता पीछे से रे,
कौन करता है मना,
कर रहा कौन भयभीत आज
भय तो है जाना-पहचाना।

किस शाप, किस ग्रह दोष से
बैठेंगे हम सुख के बालूचर पर,
पाल की रस्सी कसकर पकड़े
चलेंगे गाते-गाते गान।
आनंद-रूपी सागर में
उठा है आज ज्वार।

Thursday, July 15, 2010

गीत 8 : आज धानेर खेते रौद्र छायाय

आज धान के खेत में धूप-छाँव
खेलें खेल लुकाछिपी का।
नीले आकाश में किसने खोली
श्वेत मेघ की नौका।

आज भौंरे भूल गए मधु पीना
उड़ रहे प्रकाश के हो मतवाला,
आज किसलिए नदी तीर पर
चकवा-चकवी का लगा है मेला।

अरे आज तो मैं घर न जाऊँ भैया,
आज तो घर न जाऊँ,
अरे चीरकर आकाश को आज
मैं तो सबकुछ लुट आऊँ।

जैसे ज्वार के जल से उठता है फेन
आज की हवा में छूटती है हँसी,
आज बिताऊँगा अपना मैं सारा समय
निरुद्देश्य बजाते हुए बंशी।

Wednesday, July 14, 2010

गीत 7 : तुमि नव नव रूपे एसो प्राणे

तुम नव-नव रूपों में आओ प्राणों में।
आओ गंधों में वर्णों में, आओ गानों में।

आओ अंगों के पुलकमय स्पर्श में,
आओ चित्त के अमृतमय हर्ष में,
आओ मुग्ध मुदित दो नयनों में।
तुम नव-नव रूपों में आओ प्राणों में।

आओ निर्मल उज्ज्वल कांत
आओ सुंदर स्निग्ध प्रशांत
आओ आओ तुम विचित्रा विधानों में।

आओ दुःख में, सुख में, आओ मर्म में,
आओ नित्य सब दैनिक कर्म में,
आओ सकल कर्म-अवसानों में।
तुम नव-नव रूपों में आओ प्राणों में।

Tuesday, July 13, 2010

गीत 6 : प्रेमे प्राणे गाने गंधे आलोके पुलके

प्रेम, प्राण, गीत, गंध, आलोक और पुलक में
हो रहा प्लावित निखिल द्युलोक और भूलोक में
बरस रहा झर-झर तुम्हारा अमल अमृत।

दिशा-दिशा में टूटे सारे आज बंध
मूर्तिमान हो जाग उठा आनंद
जीवन हो उठा जीवंत कि पाया छककर अमृत।

कल्याण-रस-सरसिज में चेतना मेरी
परमानंदित हो खिल उठी शतदल-सी
निज मधु सारा तेरे चरणों में किया समर्पण।

उदार उषा के अरुणोदय की कांति जब
नीरव आलोक में, जागी उर-प्रांतर में
हट गए अलसाई आँखों के आवरण।

Monday, July 12, 2010

गीत 5 : अंतर मम विकसित करो


चित्त मेरा विकसित करो
हे अंतरयामी!
निर्मल करो, उज्ज्वल करो,
सुंदर करो हे।
जाग्रत करो उद्यत करो,
निर्भय करो हे।
मंगल करो, निरलस निःसंशय करो हे।
चित्त मेरा विकसित करो
हे अंतरयामी!

जोड़ो मुझे सबके संग,
मुक्त करो बंध,
संचरित करो सब कर्मों में
अपने निर्वेद छंद।

निःस्पंदित करो चित्त मेरा अपने पद-पद्मों में
नंदित करो, नंदित करो,
नंदित करो हे।
चित्त मेरा विकसित करो
हे अंतरयामी!

Sunday, July 11, 2010

गीत 4 : विपदे मोरे रक्षा करो

विपदा में रक्षा करना मेरी
यह न मेरी प्रार्थना,
विपदा में बस मुझको न होवे भय।
दुःख-ताप में जब चित व्यथित हो
न देना मुझको सांत्वना
दुःख में बस मेरी ही होवे जय।

घटे न आत्मबल मेरा कभी
यदि सहायता मुझको न मिले
जगत-व्यवहार में घाटा उठाऊँ
और वंचना केवल मिले
अपने मन में बस कभी न मानूँ क्षय।

बचा लो मुझे तुम
यह न मेरी प्रार्थना,
बस इतनी शक्ति बची रहे कि पार मैं पा सकूँ।
भार मेरा कम करके
न देना मुझको सांत्वना
बस इतना भर हो कि भार मैं उठा सकूँ।

सुख में भी नतशिर हो
पहचान पाऊँ मुख तुम्हारा
दुःखभरी रात में जिसदिन
निखिल धरा भी करे वंचना
बस तुम्हें लेकर न हो मुझको कोई संशय।

Saturday, July 10, 2010

गीत 3 : कतो अजानारे जानाइले तुमि

कितने अनजानों से तुमने कराया परिचय
कितने ही घरों में दिया आश्रय-
दिलों की दूरी घटाई, बनाया बंधु,
परायों को बनाया भाई।

जाने क्या होगा खाए यह चिंता
पुराने घर को जब छोड़कर जाती,
नूतन में तुम हो नित्य पुरातन
यह बात जो मैं भूल जाती।
दिलों की दूरी घटाई, बनाया बंधु,
परायों को बनाया भाई।

जीवन-मरण में, निखिल भुवन में
जब-जहाँ भी तुम मुझे अपनाओगे,
ओ जनम-जनम के मेरे परिचित,
सबसे तुम मुझे मिलाओगे।

तुम्हें जानकर रहे न कोई पर,
नहीं वर्जना और न कोई डर,
रहते तुम जाग्रत सबको मिलाकर-
पाया ऐसा ही तुमको देखा निरंतर।
दिलों की दूरी घटाई, बनाया बंधु,
परायों को बनाया भाई।

Friday, July 9, 2010

गीत 2 : आमि बहु वासनाय प्राणपणे चाइ

बहुत-सी वासनाएँ प्राणप्रिय थीं मुझको
बचाया तुमने उनसे मुझको कर वंचित।
निष्ठुर कृपा तुम्हारी है यह
मेरे जीवन भर का संचित।

न चाहने पर भी मुझे जो दिया दान,
आकाश प्रकाश तन मन प्राण,
अपनाकर मुझको दिन-प्रतिदिन तुम
उस महादान के योग्य बना
अति-इच्छा के संकट से
करते हो मुझको रक्षित।

कभी तो मैं भटकती, कभी राह चलती
तुम्हारी ही बस राह पकडे़-
पर तुम निष्ठुर, सम्मुख होकर भी
हो जाते हो मुझसे परे।

है तुम्हारी यह दया मैं जानती हूँ,
लौटाते हो जबकि तुम्हारी हूँ प्रतीक्षित,
मिलोगे इस जीवन की पूर्णता पर
अपने मिलन के योग्य बना
अधूरी इच्छा के संकट से
करते हो मुझको रक्षित।

Thursday, July 8, 2010

गीत 1 : आमार माथा नत करे दाओ

नत कर दो तुम मस्तक मेरा
अपनी चरणधूलि के तल में।
सकल अहंकार तुम मेरे
डूबो दो अँसुवन के जल में।

आत्ममुग्ध मैं गर्वित होकर
करती बस निज का अपमान,
आत्मकेन्द्रित सोच में पड़कर
मरूँ हर पल अपने चक्कर में।
सकल अहंकार तुम मेरे
डूबो दो अँसुवन के जल में।

चाहे मैं जो भी काम करूँ
आत्म-प्रचार से रहूँ दूर-
जीवन मेरा अपनाकर तुम
इच्छा अपनी करो पूर्ण।

मैं चाहूँ तेरी परम शांति,
प्राणों में तेरी परम कांति,
सहारा देकर खड़े रहो तुम
हृदय-कमल के शतदल में।

सकल अहंकार तुम मेरे
डूबो दो अँसुवन के जल में।


बांग्‍ला भाषा में लिंग और वचन निरपेक्ष क्रियाऍं होती हैं। इसलिए गीतांजलि के गीतों का अनुवाद करते हुए संबोधनकर्ता और संबोध्‍य के लिंग-निर्णय करना चुनौतीभरा काम है। लेकिन जब हम स्‍वयं कवि द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद को देखते हैं तो यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि उनका संबोध्‍य पुंलिंग ही है, क्‍योंकि रवीन्‍द्रनाथ ने संबोध्‍य के लिए प्रयुक्‍त वह, उसका जैसे शब्‍दों के लिए He अंग्रेजी शब्‍द का प्रयोग किया है। उनके गीतों में अन्‍यत्र यह साक्ष्‍य मिलता है कि उनके गीतों का संबोधनकर्ता स्‍त्रीलिंग है और इसलिए परमात्‍मा के प्रति उनकी निष्‍ठा और मिलन की आकांक्षा स्‍त्रीरूप आत्‍मा की है। यही कारण है कि मैंने गीतांजलि के गीतों का अनुवाद करते हुए संबोध्‍य को पुंलिंग और संबोधनकर्ता को स्‍त्रीलिंग माना है। अनुवाद क्रम में संबंधित साक्ष्‍यों की ओर भी संकेत करूंगा।

Wednesday, July 7, 2010

बांग्‍ला एवं अंग्रेजी 'गीतांजलि'

प्राय: साधारण पाठकों में यह भ्रम पाया जाता है कि रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर की जिस कृति को नोबेल पुरस्‍कार प्राप्‍त हुआ, वह उनकी बांग्‍ला कृति का अविकल अंग्रेजी अनुवाद है, लेकिन यह तथ्‍य सही नहीं है। वास्‍तविकता यह है कि अंग्रेजी गीतांजलि की 103 रचनाओं में से केवल 53 रचनाऍं ही रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर ने अपनी बांग्‍ला गीतांजलि से लिए हैं तथा 1 'चैताली', 1 'कल्‍पना', 15 'नैवेद्य', 1 'स्‍मरण', 3 'शिशु', 11 'खेया' से, जबकि अन्‍य रचनाऍं विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं से चयित हैं। असंकलित रचनाओं से 16 बाद में 'गीतिमाल्‍य' में और 1-1 'अचलायतन' एवं 'उत्‍सर्ग' नामक संकलनों में संगृहीत हुईं।
इसी प्रकार अंग्रेजी पाठ से अपरिचित पाठकों में से अधिकांश यह समझते हैं नोबेल पुरस्‍कार प्राप्‍त 'गीतांजलि' भी बांग्‍ला 'गीतांजलि' की तरह अंग्रेजी छंदबद्ध पद्यकृति है, लेकिन यह बात भी तथ्‍यों से परे है। वास्‍तव में यह अंग्रेजी गद्य में है। इसका प्रभाव भले ही काव्‍यात्‍मक है। यहॉं यह बात भी उल्‍लेखनीय है कि अंग्रेजी गीतांजलि की विश्‍वव्‍यापी स्‍वीकृति एक अनूदित कृति के रूप में न होकर मौलिक कृति के रूप में है। इसका प्रमुख कारण संभवत: यही है कि अपने बांग्‍ला गीतों को अंग्रेजी में प्रस्‍तुत करने क्रम में कवि ने न केवल रचना की मूल विधा से स्‍वयं को स्‍वतंत्र किया है, वरन संप्रेषण के स्‍तर पर भी मूल शब्‍द प्रयोगों के बंधन में न बंधकर केन्‍द्रीय भाव मात्र की रक्षा करते हुए प्रकारांतर से मानों एक नई भाषा में नई रचना को ही जन्‍म दिया है।
यही कारण है कि 1915 ई. में प्रकाशित प्रथम हिन्‍दी अनुवाद से लेकर 'गीतांजलि' के अद्यतन हिन्‍दी अनुवाद भी पद्य और गद्य, दोनों ही विधाओं में प्राप्‍त होते हैं। इनमें से कुछ अनुवाद मूल अंग्रेजी से किए गए हैं, जबकि कुछ मूल बांग्‍ला से। मूल अंग्रेजी से किए गए सभी अनुवाद गद्य में हैं, लेकिन मूल बांग्‍ला से किए अनुवादों में से कुछ पद्य में हैं, तो कुछ गद्य में। कुछेक अनुवादों में केवल मूल अंग्रेजी में संकलित गीतों को मूल बांग्‍ला से अनुवाद कर प्रस्‍तुत किया गया है।
हिन्‍दी में 'गीतांजलि' के अब तक 38 अनुवाद और 10 देवनागरी लिप्‍यंतर प्रकाशित हुए हैं। 2010 बांग्‍ला 'गीतांजलि' के प्रकाशन की शतवार्षिकी है। इस अवसर पर इंटरनेट के पाठकों के लिए बांग्‍ला 'गीतांजलि' का एक और हिन्‍दी अनुवाद प्रस्‍तुत करने का संकल्‍प मैंने लिया है। आशा है, सबके द्वारा इसे पसंद किया जाएगा। प्रतिक्रियाओं और सुझावों का निरंतर स्‍वागत है।