पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Thursday, December 8, 2011

गीत 65

जाने कब मैं बाहर निकली गान तुम्‍हारे ही गाते--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।
भूल गई हूँ जाने कब से चाहत तुम्‍हारी मन में--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।

झरना जैसे बाहर निकलता
किसकी चाहत नहीं जानता
वैसे ही आई हूँ दौड़ी
जीवनधारा के संग बहती
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।

कितने ही नामों से रही पुकारती
कितनहीं छवियॉं रही ऑंकती
जाने किस आनंद में चलती रही
उसका ठिकाना पाए बिना--
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।

पुष्‍प जैसे प्रकाश के लिए
काटे अबोध जगकर के रात
वैसे ही तुम्‍हारी चाहत में
मेरा हृदय पड़ा है बिछकर
यह तो आज की नहीं, हॉं आज की बात नहीं।