पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Monday, May 27, 2019

गीत 88 : चाइ गो आमि तोमारे चाइ

चाहती, मैं तुम्हीं को चाहती
तुम्हीं को चाहती मैं--
यह बात सदा है मन में
पर कह न पाती मैं ।
और जो कुछ वासना में
घूमता–फिरता रात–दिन
झूठ है वह, झूठ है सब, बस
तुम्हीं को चाहती मैं ।

जैसे रात छिपाए रखती
आलोक की प्रार्थना ही--
वैसे ही गहन मोहवश
तुम्हीं को चाहती मैं ।
झंझा जब भंग करती शांति
वह भी प्राणों में चाहे शांति,
वैसे ही तुम पर आघात कर भी
तुम्हीं को चाहती मैं ।

Friday, May 24, 2019

गीत 87 : छिन्न क'रे लओ हे मोरे

तोड़ लो मुझे तुम हे,
और न करो देर
झड़कर न धूल में मिल जाऊँ
यह भय मुझे दे टेर।
यह फूल तुम्हारी माला में
गूँथ पाएगा, यह नहीं जानता
पर शायद तुम्हारा आघात
हो उसका भाग्यलेख
तोड़ लो, तोड़ लो,
और न करो देर।

जाने कब दिन ढल जाएगा
अंधकार के साथ आएगा
जाने कब तुम्हारी पूजा–बेला
गुजर जाएगी अदेख।
जितना भी इसमें रंग भरा है
गंध–सुधा से हृदय भरा है
अपनी सेवा में वही स्वीकारो
जब तक है यह बेर
तोड़ लो, तोड़ लो,
और न करो देर।

Thursday, May 23, 2019

गीत 86 : आमारे यदि जागाले आजि, नाथ

जब आज जगाया मुझको नाथ,
लौटना मत तब, लौटना मत,
करो करुणा दृष्टिपात।
निबिड़ वन–शाखा के ऊपर
आषाढ़–मेघ, आँधी–पानी में,
बादल छाए, अलसाई–सी
सोई पड़ी है रात।
लौटना मत तब, लौटना मत,
करो करुणा दृष्टिपात।

अविराम बिजली की घात
नींद गँवाए प्राण
वर्षाजल–धारा के साथ
गाना चाहें गान।
हृदय मेरी आँखों के जल में
बाहर आकर तिमिर–तल में
व्याकुल हो खोजे आकाश
बढ़ाकर दोनों हाथ।
लौटना मत तब, लौटना मत,
करो करुणा दृष्टिपात।

Wednesday, May 22, 2019

गीत 85 : एका आमि फिरबो ना आर

एकाकी अब मैं नहीं लौटूँगा
ऐसे ही--
निज मन के कोने–कोने में
मोह के घर में ।
तुम्हें अकेले बाहुपाश में जकड़
घेरा छोटा करते पाया
केवल खद को ही है बाँधा
अपने बंधन में ।

जब मैं पाऊँगा तुमको
निखिल मध्य में
उसी क्षण हृदय में पाऊँगा
हृदय विराजे ।
यह चित्त मेरा वृंत केवल
उसके ऊपर विश्व–कमल
उसके ऊपर पूर्ण प्रकाश
दिखाओ मुझे ।

Tuesday, May 21, 2019

गीत 84 : आमार एकला घरेर आड़ाल भेङे

अपने एकाकी घर की दीवार तोड़
विशाल भवसागर
प्राण–रथ के सहारे
करूँगा पार कब ।
प्रबल प्रेम में सबके बीच
जुटा हुआ सबके कामों में
हाट–बाट में चलते–चलते
संग तुम्हारे होगा मिलन ।
प्राण–रथ के सहारे
करूँगा पार कब ।

निखिल आशा–आकांक्षा युक्त
दुख में, सुख में
झाँपी दे उसकी तरंगों को
रखूँ हृदय में ।
मंद–मधुर आघात–वेग में
हृदय तुम्हारा जाग उठेगा
सुनूँगा वाणी विश्वजन के
कलरव में ।
करूँगा पार कब 
प्राण–रथ के सहारे ।

Thursday, May 16, 2019

गीत 83 : कथा छिलो एक तरीते केवल तुमि आमि

बात हुई थी, एक नाव में केवल हम–तुम
जाएँगे यूँ ही केवल बस बहते–बहते,
त्रिभुवन में न जान पाएगा कोई
हम तीर्थगामी जा रहे किस देश में ।
कूल खोए उस समुद्र के बीच
सुनाकर गान केवल तुम्हारे कान में
लहार की भाँति भाषा–बंधन से मुक्त
मेरी वह रागिनी सुनोगे मौन मुस्कान में ।

आज भी समय मिला न उसे, काम रहा क्या बाकी  ।
देखो अब तो संध्या उतरे सागर तट पर ।
क्षीण प्रकाश में पंख पसारे सिंधु–पार के पाखी
लौट चुके वे सब भी अपने–अपने तट पर ।
काटने को बंधन सारे अब
तुम ही कहो, कब आओगे घाट,
सूर्यास्त की अंतिम आभा–सी
बहेगी नाव निरुद्देश सारी रात ।

Thursday, May 9, 2019

गीत 82 : एइ ज्योत्स्नाराते जागे आमार प्राण

इस ज्योत्स्नाभरी रात में जागे मेरे प्राण
जगह मिलेगी क्या आज तुम्हारे पास
देख पाऊँगा मुख वह अपूर्व
रहेगा सर्वदा हृदय उत्सुक
बार–बार चरणों के गिर्द
घूमेंगे मेरे अश्रुभरे गान ?

साहस कर तुम्हारे पद–मूल में
नहीं कर पा रहा ख़ुद को समर्पित
खड़ा हूँ नजरें गड़ाए माटी में
कहीं लौटा न दो यह मेरा दान ?
यदि तुम मेरा हाथ पकड़कर
पास आ, मुझे उठ जाने को बोलो
तभी प्राणों की असीम दरिद्रता का
इसी क्षण हो जाएगा अवसान ।