पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Wednesday, April 4, 2012

गीत 68

मेरा खेल साथ तुम्‍हारे जब होता था
तब, कौन हो तुम, यह किसे पता था।
तब, नहीं था भय, नहीं थी लाज मन में, पर
जीवन अशांत बहता जाता था
तुमने सुबह-सवेरे कितनी ही आवाज लगाई
ऐसे जैसे मैं हूँ सखी तुम्‍हारी
हँसकर साथ तुम्‍हारे रही दौड़ती फिरती
उस दिन कितने ही वन-वनांत।

ओहो, उस दिन तुमने गाए जो भी गान
उनका कुछ भी अर्थ किसे पता था।
केवल उनके संग गाते थे मेरे प्राण,
सदा नाचता हृदय अशांत।
हठात् खेल के अंत में आज देखूँ कैसी छवि--
स्‍तब्‍ध आकाश, नीरव शशि-रवि,
तुम्‍हारे चरणों में होकर नत-नयन
एकांत खड़ा है भुवन।

Tuesday, April 3, 2012

गीत 67

हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज
लेकर हाथों में अरुणवर्णी पारिजात।

सोई थी नगरी, पथिक नहीं थे पथ पर,
चले गए अकेले, अपने सोने के रथ पर-
ठिठक कर एक बार मेरे वातायन की ओर
किया था तुमने अपना करुण दृष्‍टिपात।
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज।

स्‍वप्‍न मेरा किस गंध से हुआ सुवासित,
किस आनंद से कॉंप उठा घर का अँधेरा,
धूल में पड़ी नीरव मेरी वीणा
बज उठी अनाहत, पाकर कौन-सा आघात।

कितनी ही बार सोचा मैंने--उठ पड़ूँ,
आलस त्‍याग पथ पर जा दौड़ूँ,
उठी जब, तब तुम थे चले गए--
अब तो शायद न होगा तुमसे साक्षात्
हे सुंदर, तुम आए थे प्रात: आज।