पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Thursday, October 21, 2010

गीत 55

आज बसंत जीवंत द्वार पर
अपने अवगुंठित कुंठित जीवन में
मत करो विडंबित उसको।

आज खिलने दो ह़दय-कमल को,
आज भूलो अपना-पराया भूलो
इस संगीत-मुखरित गगन में
अपनी गंध तरंगित कर डालो
इस बहिर्जगत में खोकर दिशा
दो विखेर माधुर्य चतुर्दिक।

अति निविड़ वेदना वन के अंतर में
आज पल्‍लव पल्‍लव से मुखरित रे--
दूर गगन में किसकी राह निहार
आज व्‍याकुल वसुंधरा सजती रे।

मेरे प्राणों को सिहराए दक्षिणी हवा
किसे द्वार-द्वार पर देती दस्‍तक,
यह सौरभ-विह्वल रजनी
किन चरणों के धरणीतल में जाग रही।

ओ रे सुंदर वल्‍लभ, कांत
तेरा गंभीर आह्वान किसके लिए।

1 comment:

  1. I am very happy to see this Hindi translation of Gurudev Tagore's Gitanjali in Hindi. For a long time I have been trying to find the Hindi translation of the great poem "Where the mind is without fear and the head is held high" but I did not find it anywhere. Did you translate it? If not, I will request you to please translate it for Hindi speakers to feel its beauty and greatness.. My email mridulaghosh1@gmail.com Thank you.

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