पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Tuesday, August 31, 2010

गीत 40 : जा हारिये जाय ता आगले ब'से

जो खो जाता है, उसे बैठकर
जोगूँ और कितना।
अब रात में जाग न सकती नाथ
संभव भी न सोचना।

दिन-रात हूँ मैं अनवरत
बंद किए हुए अपना द्वार,
आना जो चाहे, शंका में उसे
भगा देती बार-बार।

तभी तो आना किसी का हुआ नहीं
बस मेरे ही घर।
आनंदमय भुवन तुम्हारा
रहे खेलता बाहर।

जानूँ तुम्हें भी राह न मिलती,
लौट जाते हो आ-आकर,
जिसे रखना चाहूँ, वह भी न रहे-
मिट्टी में मिल जाए।

Monday, August 30, 2010

गीत 39 : हेथा जे गान गाइते आसा आमार

यहाँ जो गीत गाने आई थी मैं
वह गीत गाया जा न सका-
आज भी सुर-साधना ही हो रही बस
मैं तो चाहूँ गीत गाना।

मुझसे सधता ही नहीं वह सुर
मुझसे उठते नहीं वे बोल,
केवल प्राणों के ही बीच उठी है
गाने की व्याकुलता।
आज भी खिला ही नहीं वह फूल
बस बहती एक-सी हवा।

मैंने देखा नहीं मुख उसका
मैंने सुनी न उसकी वाणी,
केवल पल-पल सुनती उसकी
पैरों की बस ध्वनि।
मेरे द्वार के सामने से ही वह
करता है आना-जाना।

केवल मैं आसन ही रही बिछाती
गुजर गया सारा दिन-
घर में दीप जलाना हुआ नहीं है
कैसे जाए उसे पुकारा।
हूँ उसको पाने की आशा में
हुआ न उससे मिलना।

Friday, August 27, 2010

गीत 38 : शरते आज कोन अतिथि

शरत में आज कौन अतिथि
आया प्राणों के द्वारे।
आनंद-गान गा रे हृदय
आनंद-गान गा रे।

नीले आकाश की नीरव कथा
शिशिर में भीगी व्याकुलता
मुखरित हो ये आज तुम्हारी
वीणा के तार-तार में।

धान के खेतों के स्वर्ण गान में
लय मिला रे आज समान तान में,
मिला दे सुर प्लावित नदी की
अमल जलधार में।

आया है जो उसके मुख पर
देख चाहकर गहन सुख में
द्वार खोलकर साथ में उसके
बाहर निकल जा रे।

Thursday, August 26, 2010

गीत 37 : निशार स्‍वपन छुटलो रे एइ

रात्रि स्वप्न टूट गया रे
टूट गया रे।
छूटा बंधन छूट गया रे।

प्राणों पर अब रहा न परदा,
जगत-जंजाल से बाहर आए,
हृदय शतदल की पंखुड़ियाँ सब
अब खिल गईं रे
खिल गईं रे।

अंततः तोड़कर द्वार मेरा
जैसे ही सम्मुख खड़े हुए
आँसुओं में डूबा हृदय
चरण-तलों में लोट गया रे।

आकाश से प्रभात-किरणों ने
बढ़ाए हाथ मेरी ओर,
मेरी कारा के टूटे द्वार से
जय ध्वनि फूट चली रे
फूट चली रे।

Wednesday, August 25, 2010

गीत 36 : पारबि ना कि जोग दिते एइ छंदे रे

बिठा न पाओगे लय-ताल क्या इस छंद में,
इस गिर जाने, बह जाने
टूट जाने के आनंद में।

कान लगाकर सुनो न
दिशा-दिशा में, गगन-बीच भी
कालवीणा पर क्या सुर बाजे
तपन तारा-चाँद में
यह आग जलाकर धू-धूकर
जल जाने के आनंद में।

पगलानेवाली गान की तान में
दौड़े यह कहाँ, कोई न जाने,
पीछे मुड़कर न देखना चाहे
रहे न बँधकर किसी बंध में
इस लुट जाने, छूट जाने
चलने के आनंद में।

उसी आनंद-चरण-पथ में
षड् ऋतुएँ हैं उन्मत्त नृत्य में,
धरती प्लावित होती जाए
स्वागत-गीत की गंध में
इस फेंके जाने, छोड़े जाने
मर जाने के आनंद में।

Tuesday, August 24, 2010

गीत 35 : एसो हे, एसो, सजल घन

आओ हे आओ सजल घन,
बरसने को बादल-
आओ हे लेकर इस जीवन में
विपुल अपना स्नेह श्यामल।

आओ हे गिरि-शिखर चूमकर
छाया बन जंगल-धरा पर-
आओ हे तुम गगन में छाकर
करते हुए घोर गर्जन।

व्यथित हो उठे कदंब के वन
पुलकित हैं फूल।
उछल रहे करते कल-रोदन
नदियों के सब कूल।

आओ हे आओ हृदयविहारी,
आओ हे आओ तृष्णाहारी,
आओ हे नयन-सुखकारी,
आन बसो मेरे मन।

Monday, August 23, 2010

गीत 34 : आमार मिलन लागि तुमि

मेरे मिलन के लिए तुम
हो कब से ही आ रहे।
कहाँ रखेंगे ढँककर तुमको
चंद्र-सूर्य तुम्हारे।

कितनी ही बार साँझ-सकारे
तुम्हारी पगचाप सुनाई पड़े।
दूत चुपके से अंतरतर में
गया है मुझको बुलाके।

अरे ओ पथिक, आज तो मेरे
प्राणों में है स्पंदन
रह-रहकर उठती है देखो
हर्ष की सिहरन।

देखो समय आ गया आज,
खत्म हुए सब मेरे काज-
हवा आ रही हे महाराज,
तुम्हारी गंध लेके।