पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Thursday, August 26, 2010

गीत 37 : निशार स्‍वपन छुटलो रे एइ

रात्रि स्वप्न टूट गया रे
टूट गया रे।
छूटा बंधन छूट गया रे।

प्राणों पर अब रहा न परदा,
जगत-जंजाल से बाहर आए,
हृदय शतदल की पंखुड़ियाँ सब
अब फूट गई रे
फूट गई रे।

अंततः तोड़कर द्वार मेरा
जैसे ही सम्मुख खड़े हुए
आँसुओं में डूबा हृदय
चरण-तलों में लोट गया रे।

आकाश से प्रभात-किरणों ने
बढ़ाए हाथ मेरी ओर,
मेरी कारा के टूटे द्वार से
जय ध्वनि उठ चली रे
उठ चली रे।

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