पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Friday, August 13, 2010

गीत 27: आज वारि झरे झर झर

आज बरस रहा पानी झर-झर
भरी बदरी से।
आकाश फोड़कर आकुल धारा
कहीं न ठहरे।

ठहर-ठहरकर शाल वनों में
आँधी चली भर हुँकारे,
झूम-झूमकर पानी बरसे
मैदानों में।
आज मेघ-घटाएँ लहराकर
नाच रहा है कौन।

अरे वर्षा पर मोहित मेरा मन,
हुआ निछावन झंझा पर,
दंडवत होकर तरंग मेरी
पड़ी है किसके चरणों पर।

अंतर में आज कैसा कोलाहल,
तोड़कर द्वारों की अर्गलाएँ
जाग गया अंतर का पागल
इस भादो में।

आज ऐसे कौन हुआ उन्मत्त
बाहर और घर में।

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