पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Thursday, August 12, 2010

गीत 26 : आर नाइ रे बेला, नामल छाया

और बचा न दिन, उतरी छाया
धरती पर।
अब कलशे भरने को चल रे
घाट पर।

जलधारा के कलकल स्वर में
सांध्य गगन करता आकुल,
अरे पुकारे उन्हीं स्वरों में
पथ पर।
कलशे भरने को चल रे
घाट पर।

अब विजन पथ पर न कोई
आता-जाता-
अरे प्रेम-नदी में ज्वार उठा,
उत्ताल हवा।

नहीं जानती, लौटूँगी या नहीं,
आज होगा किससे परिचय,
घाट पर वही अजाना बजाए वीणा
नौका पर।
कलशे भरने को चल रे
घाट पर।

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