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Friday, September 17, 2010

गीत 49 : हेथाय तिनि कोल पेतेछेन

यहीं आन वे आज विराजे
हमलोगों के इस घर में।
सजा दो उनका आसन भाई
अच्छा लगे जो मन में।

आनंद-मग्न हो गाते हुए
धूल बुहारो, झाड़ो सारी।
सावधानी से दूर हटा दो
कूड़ा-कचरा है जो भी।
जल छिड़ककर फूलों को
रखो भरकर डाली में-
सजा दो उनका आसन भाई,
अच्छा लगे जो मन में।

दिन-रात वे हैं विराजे
हमलोगों के इस घर में,
सुबह-सवेरे उनकी हँसी
आलोक बिखेरे घर में।

ज्योंही सुबह जागकर उठकर
नयन मिलाना चाहूँ।
खुश हो वे खुश देखना चाहें
मुझको, ऐसा पाऊँ।
उनके मुख की हँसी-खुशी
भर जाए पूरे घर में।

सुबह-सवेरे उनकी हँसी
आलोक बिखेरे घर में।
अकेले ही वे बैठे रहते
हमलोगों के इस घर में।

हमसब जब भी अन्य कहीं
चले जाते अपने काम में।
द्वार तक आ प्रसन्न मुख से
विदा हमको हैं वे कर जाते-
प्रमुदित मन से बढ़ते पथ पर
आनंदित हो हम गाते-गाते।

निपटाकर सारे काम जब लौटें
दिन ढलने पर हम घर में,
पाएँ उनको अकेले बैठे
हमलोगों के इस घर में।

वे जगे हुए बैठे रहते हैं
हमलोगों के इस घर में
हम सब जब चेतना खोकर
सोए रहते हैं बिस्तर में।

जगत में कोई देख न पाता
छुपी हुई उनकी बाती,
ओट में रखकर आँचल के
वे सारी रात जलाएँ जोती।

नींद में बहुत सारे सपने
हैं आते-जाते रहते,
अंधकार में मुस्काते वे
हमलोगों के इस घर में।

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