पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Tuesday, September 21, 2010

गीत 51 : कोन आलोते प्राणेर प्रदीप

किस प्रकाश से प्राण-प्रदीप
जलाकर तुम धरा पर आते-
ओ रे साधक, ओ रे प्रेमी,
ओ रे पागल, धरा पर आते।

इस अकूल संसार में
दुःख-आघात तुम्हारी प्राणवीणा की झंकार में।
घोर विपदा-बीच भी,
किस जननी के मुख की हँसी देखकर हँसते।

तुम हो किसके संधान में
सकल सुखों में आग लगाकर घूम रहे, कोई न जाने।
इस तरह आकुल-व्याकुल कर
कौन रुलाए तुम्हें, जिसे तुम प्यार हो करते।

तुम्हारी कोई चिन्ता नहीं-
कौन तुम्हारा संगी-साथी, यही सोचती मन में।
मृत्यु को भूलकर तुम
किस अनंत प्राण-सागर में आनंदित हो तिरते।

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