पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Thursday, May 16, 2019

गीत 83 : कथा छिलो एक तरीते केवल तुमि आमि

बात हुई थी, एक नाव में केवल हम–तुम
जाएँगे यूँ ही केवल बस बहते–बहते,
त्रिभुवन में न जान पाएगा कोई
हम तीर्थगामी जा रहे किस देश में ।
कूल खोए उस समुद्र के बीच
सुनाकर गान केवल तुम्हारे कान में
लहार की भाँति भाषा–बंधन से मुक्त
मेरी वह रागिनी सुनोगे मौन मुस्कान में ।

आज भी समय मिला न उसे, काम रहा क्या बाकी  ।
देखो अब तो संध्या उतरे सागर तट पर ।
क्षीण प्रकाश में पंख पसारे सिंधु–पार के पाखी
लौट चुके वे सब भी अपने–अपने तट पर ।
काटने को बंधन सारे अब
तुम ही कहो, कब आओगे घाट,
सूर्यास्त की अंतिम आभा–सी
बहेगी नाव निरुद्देश सारी रात ।

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