पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Monday, July 19, 2010

गीत 12 : लेगेछे अमल धवल पाले

अमल धवल पाल से लगती
मंद-मधुर हवा।
देखी नहीं, कभी ना देखी
तिरते ऐसे नइया।

किस सागर के पार से लाती
सुदूर पड़ा कौन-सा धन।
मन भी चाहे बहते जाना,
छोड़ते जाना इसी किनारे
जो भी सब चाहा-पाया।

पीछे लगी है जल की झड़ी
गुरु गुरु बोले मेघ,
चेहरे पर पड़ती अरुण किरण
जब फट जाते मेघ।

अरे ओ कर्णधार, कौन हो तुम,
किसकी खुशी-रूलाई का धन।
सोच-सोच विचलित मेरा मन,
किस सुर में आज सजेंगे साज
किस मंत्र का होगा गान।

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