पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Saturday, July 24, 2010

गीत 17 : कोथाय आलो, कोथाय ओरे आलो

कहाँ है प्रकाश, प्रकाश है कहाँ अरे?
विरहानल की ज्वाला से जलाओ उसे।
दीपक है रखा, पर नहीं है शिखा,
है क्या यही, कपाल पर लिखा-
इससे तो अच्छा मर जाना।
विरहानल से दीप जलाना।

वेदना देती आकर संदेश-‘अरे ओ प्राण,
तुम्हारे लिए ही जाग रहे भगवान।
घनी अँधेरी रात में बुला रहे
प्रेमाभिसार के लिए तुझे,
दुःख देकर रखते तेरा मान।
तुम्हारे लिए ही जाग रहे भगवान।’

आकाश गया है बादलों से भर,
बरस रहा है पानी झर-झर।
किसके लिए घोर ऐसी रात में
जाग उठे हैं अचानक प्राण मेरे
ऐसा कयों होता रह-रहकर।
बरस रहा है पानी झर-झर।

क्षण भर का यह विद्युत प्रकाश,
आँखों में लाता घनांधकार।
न जाने कहाँ, कहीं बहुत दूर
गान बजा, है गहन सुर,
खींचता मेरे प्राण अपनी ओर।
आँखों में लाता घनांधकार।

कहाँ है प्रकाश, प्रकाश कहाँ है अरे?
बिरहानल की ज्वाला से जलाओ उसे।
बुलाता मेघ, हाँकती हवा,
न होगा जाना, जो सय गया,
है रात काली, निकष-घन जैसे।
प्रेम का दीपक जलाओ प्राण देके।

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