पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Friday, July 9, 2010

गीत 2 : आमि बहु वासनाय प्राणपणे चाइ

बहुत-सी वासनाएँ प्राणप्रिय थीं मुझको
बचाया तुमने उनसे मुझको कर वंचित।
निष्ठुर कृपा तुम्हारी है यह
मेरे जीवन भर का संचित।

न चाहने पर भी मुझे जो दिया दान,
आकाश प्रकाश तन मन प्राण,
अपनाकर मुझको दिन-प्रतिदिन तुम
उस महादान के योग्य बना
अति-इच्छा के संकट से
करते हो मुझको रक्षित।

कभी तो मैं भटकती, कभी राह चलती
तुम्हारी ही बस राह पकडे़-
पर तुम निष्ठुर, सम्मुख होकर भी
हो जाते हो मुझसे परे।

है तुम्हारी यह दया मैं जानती हूँ,
लौटाते हो जबकि तुम्हारी हूँ प्रतीक्षित,
मिलोगे इस जीवन की पूर्णता पर
अपने मिलन के योग्य बना
अधूरी इच्छा के संकट से
करते हो मुझको रक्षित।

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