पढि़ए प्रतिदिन : एक नया गीत

Friday, July 30, 2010

गीत 23 : एमन आड़ाल दिये लुकिये गेले चलबे ना

ऐसे ओट लेकर छिपने से
कैसे चलेगा।
अब बीच हृदय में बैठो छुपकर
न कोई जान पाएगा, न टोकेगा।

तुम्हारी लुकाछिपी की दुनिया में,
कितना घूमूँ देश-विदेश,
अब वचन दो मुझको नहीं छलोगे
मन के कोने में रहोगे।
ओट लेकर छिपने से
कैसे चलेगा।

जानूँ मेरा यह हृदय कठोर
सखे पर क्या तुम्हारा परस पाकर भी
डाल दिया तुमने मुझे किस फंदे में
इसमें न आएगी सरसता।

नहीं है, मेरी नहीं साधना,
किंतु जो बरसे कृपा तुम्हारी।
तब निमिष में क्या फूल न खिलेंगे
और क्या फल न फलेगा।
ओट लेकर छिपने से
कैसे चलेगा।

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